तेरे आंखों की वो चमक
तेरे होंठो की वो हंसी
मानो जैसे थम सी गई है
तुझ में तू कम सा है मानो कुछ अंश तेरा छिन गया है
तेरी आंखे जो घंटों बातें करते ना थकती थी
आज ना जाने क्या खोज रहीं है
तुझे बरसों से जानने के बाद भी
आज तू अजनबी सा लगा
तेरे रग रग से मैं था वाकिफ
पर तेरे अन्दर उठते इस तूफ़ान को
ना मैं पहचान पाया और ना ही रोक पाया
अफसोस इस बात का है
जो मैं तुझ में ना देख पाया
वो तू मुझ में भी ना देख पाया
हम दोनों गुज़र रहे थे एक ही दौर से
गर पता होता तो यह सफर साथ में तय कर लेते
गिरते संभलते लड़खड़ाते
पर अपनी पहचान फिर से पा लेते
पर अब देर हो गई है
हमारे बीच ये फासले जो आ गए हैं
वैसे तो उम्मीद का एक अंश अब भी बाकी है
कि शायद मैं पलट के देखूं और तुझे सामने पाऊं
पर यदि ऐसा ना हुआ तो डर है
कहीं मैं बिखर ना जाऊं
यही सोच मुझे असमंजस में डाल देती है
और मेरे कदम तेरे से दूर बढ़ने लगते है
बस एक दुआ लब पे रह जाती है
काश किसी मोड़ पे हम फिर यूंही मिल जाए जैसे समुद्र को किनारा मिलता है